Apr 04 2025 / 11:31 PM

कल है शीतला अष्टमी, जानें पूजा विधि और महत्व

शीतला मां का उल्लेख सर्वप्रथम स्कन्दपुराण में मिलता है, इनको अत्यंत सम्मान का स्थान प्राप्त है। इनका स्वरूप अत्यंत शीतल है और रोगों को हरने वाला है। इनका वाहन है गधा, तथा इनके हाथों में कलश, सूप, झाड़ू और नीम के पत्ते हैं। मुख्य रूप से इनकी उपासना गरमी के मौसम में की जाती है। इनकी उपासना का मुख्य पर्व “शीतला अष्टमी” है।

शीतला मां का उल्लेख सर्वप्रथम स्कन्दपुराण में मिलता है, इनको अत्यंत सम्मान का स्थान प्राप्त है। इनका स्वरूप अत्यंत शीतल है और रोगों को हरने वाला है। इनका वाहन है गधा, तथा इनके हाथों में कलश, सूप, झाड़ू और नीम के पत्ते हैं। मुख्य रूप से इनकी उपासना गर्मी के मौसम में की जाती है। इनकी उपासना का मुख्य पर्व “शीतला अष्टमी” है। इस बार शीतला अष्टमी का पर्व 28 मार्च को मनाया जाएगा।

शीतला माता की ऐसे पूजा करें-
-इस दिन से ठंडे पानी से स्नान शुरू होता है, क्योंकि सूर्य एक दम सीधे ऊपर आ जाने से गर्मी बढ़ जाती है।

-इस दिन गंगाजल डालकर स्नान करें। नारंगी वस्त्र पहनें।

-दोपहर 12 बजे शीतला मंदिर जाकर माता की पूजा करें।

-माता को सुगंधित फूल, नीम के पत्तों और सुगंधित इत्र डालकर पूजा करें।

-शीतला माता को ठंडे या बासी खाने का भोग लगाएं।

-कपूर जलाकर आरती करें।

-ॐ शीतला मात्रै नम: मंत्र का जाप करें।

बासी खाने का महत्व-
-शीतला अष्टमी के दिन घर में ठंडा और बासी खाना खाया जाता है। इस दिन सुबह के समय घर में चूल्हा नहीं जलाते हैं। इस दिन थोड़ा नीम की पत्तियां भी खानी चाहिए।

-इस दिन ठंडा बासी पुआ, पूरी, दाल भात, मिठाई का माता को भोग लगाकर खाया जाता है।

-खाने से पहले भोजन दान भी करना चाहिए।

शीतला माता की कथा-
एक गावं था वहां एक बूढ़ी माता रहती थी। एक बार गांव में आग लग गई थी। पूरा गाव जल गया था। लेकिन बूढ़ी माता का घर बच गया था। सबने बूढ़ी माता को पूछा कि उनकी झोपड़ी कैसे बच गई। बूढ़ी माता ने बताया कि वह चैत्र कृष्ण अष्टमी को व्रत रखती हैं। शीतला माता की पूजा करती हैं। बासी ठंडी रोटी खाती हैं। इस दिन चूल्हे की आग नहीं जलाती हैं। यही वजह है कि शीतला माता ने आग से मेरी झोपड़ी बचा ली। तभी से पूरे गांव में शीतला माता की पूजा की जाने लगी।

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